सामुदायिक जलभराव से सजीव हुआ पूटाडांड - हरियाली और खुशहाली की नई सुबह

सामुदायिक जलभराव से सजीव हुआ पूटाडांड - हरियाली और खुशहाली की नई सुबह

जिला ब्यूरो मृत्युंजय सोनी 

एमसीबी - कभी सूखे खेतों और पानी की कमी से जूझने वाला ग्राम पूटाडांड आज हरियाली और खुशहाली की नई कहानी लिख रहा है। पहले इस क्षेत्र में गर्मी के मौसम में कुएं और तालाब सूख जाते थे, खेतों में दरारें पड़ जाती थीं, और किसान पानी की तलाश में भटकते थे। लेकिन आज वही गांव चारों ओर से हरा-भरा है, खेतों में फसलें लहराती हैं और किसानों के चेहरों पर संतोष की मुस्कान है। यह परिवर्तन संभव हुआ है मनरेगा के तहत 8.49 लाख रुपए की लागत से निर्मित सामुदायिक जल भराव कार्य से। यह जल भराव निर्माण केवल एक परियोजना नहीं, बल्कि गांव की मेहनत, एकजुटता और विकास की जीवंत मिसाल है। ग्राम पंचायत मुसरा के अंतर्गत पूटाडांड में किए गए इस कार्य ने ग्रामीणों को न केवल सिंचाई का भरोसेमंद साधन दिया, बल्कि उनकी आजीविका को भी मजबूत किया। अब खेतों में नमी बनी रहती है, फसलों की पैदावार बढ़ी है और पानी का स्तर भी ऊपर उठने लगा है।

जल संरक्षण की पहल - सामूहिक प्रयास से मिली सफलता

ग्राम पूटाडांड में वर्षों से सिंचाई का संकट था। खेतों में अंतिम पानी की कमी के कारण किसान अक्सर अपनी फसल अधूरी छोड़ देते थे। बरसात के कुछ दिनों बाद ही खेत सूख जाते और मेहनत बेकार चली जाती थी। ऐसे में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के अंतर्गत सामुदायिक जल भराव निर्माण की योजना स्वीकृत की गई।

इस योजना का मुख्य उद्देश्य था 

 गांव के हर खेत तक पानी पहुंचाना, जल संरक्षण बढ़ाना और भू-जल पुनर्भरण को प्रोत्साहित करना। इस कार्य से गांव के सैकड़ों लोगों को रोजगार भी मिला। बारिश के पानी का संचयन अब इस जलभराव में होता है, जिससे आसपास की जमीन में नमी बनी रहती है और कुओं-हैंडपंपों में भी पानी का स्तर स्थिर बना है।

तकनीकी दृष्टि से सटीक और वैज्ञानिक निर्माण

निर्माण कार्य को पंचायत की निगरानी में तकनीकी मार्गदर्शन के साथ पूरा किया गया। पहले स्थल का सर्वेक्षण कर ढलान, मिट्टी की प्रकृति और जल निकासी का पूरा अध्ययन किया गया। इंजीनियरों की देखरेख में डिजाइन तैयार कर निर्माण आरंभ हुआ। काम पूरी तरह मनरेगा के दिशा-निर्देशों के अनुरूप और वैज्ञानिक पद्धति से किया गया। इस प्रक्रिया में स्थानीय मजदूरों की सक्रिय भागीदारी रही, जिससे गांव के लोगों को रोजगार भी मिला और कार्य में आत्मीयता का भाव भी जुड़ा।

खेती में आई नई जान - बढ़ी उपज और आत्मविश्वास

अब पूटाडांड में पानी की कोई कमी नहीं है। पहले जहां खेतों में आधी फसल ही कट पाती थी, वहीं अब किसान धान, सब्जी और रबी फसलें आराम से ले पा रहे हैं। किसानों हरमंगल, धीरसाय, सीतारा, जशलाल, शिवशंकर, जयकरन, रामप्रसाद और रामसुंदर जैसे परिवार बताते हैं कि जल भराव के कारण लगभग 6 से 7 एकड़ भूमि में लगातार सिंचाई हो रही है। इससे उपज दोगुनी हो गई है, पशुपालन को भी सहारा मिला है और गांव के युवाओं को रोजगार के नए रास्ते खुले हैं।

सामुदायिक सहयोग से मिला आत्मनिर्भरता का सूत्र

पूटाडांड का यह जलभराव कार्य गांव की सामूहिक एकजुटता का प्रतीक है। ग्रामीणों ने खुद काम में भाग लिया, श्रमदान किया और योजना को सफल बनाया। आज यह जलाशय न केवल खेती बल्कि पशुपालन, सब्जी उत्पादन, बागवानी और घरेलू उपयोग के लिए भी वरदान बन चुका है। गांव के चारों ओर हरी फसलें, पेड़ों की छाया और जलाशय का शांत जल - यह सब गांव के बदलते भविष्य की गवाही दे रहे हैं।

ग्रामवासियों की खुशी - अब खेतों में उम्मीदों की हरियाली

ग्राम के बुजुर्ग किसान बताते हैं कि पहले रबी की फसल बोना लगभग असंभव था, लेकिन अब पानी की उपलब्धता से धान के बाद गेहूं और चना जैसी फसलें भी हो रही हैं। “अब हमारे खेत सालभर हरे रहते हैं, जानवरों के लिए चारा है और घर की आमदनी भी बढ़ गई है। महिलाएं भी अब सब्जी की खेती कर स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से अपनी आय बढ़ा रही हैं।

सतत विकास और आत्मनिर्भरता की दिशा में बढ़ता कदम

ग्राम पंचायत मुसरा का यह सामुदायिक जल भराव क्षेत्र आज ग्रामीण विकास का प्रेरणादायी उदाहरण बन गया है। इस योजना ने जल संरक्षण, रोजगार, पर्यावरण और आजीविका, सभी को एक सूत्र में जोड़ दिया है। यह 8.49 लाख रुपए की लागत से निर्मित यह परियोजना बताती है कि जब सरकार की योजना और जनता की भागीदारी मिलकर काम करती है, तो परिवर्तन अवश्य होता है।